काश के मैं अपने ज़ख़्म, रफू कर पाताआँसुओं से इन ग़मों का वूज़ू कर पाता ॥
The Poetry of Saiyed Abdal
अब्दाल की कलम से
Ghazal and sher, love and Sufism — written in Hindi and Urdu. The complete collection, gathered in one place.
Abdal
The book
जुर्रत आमोज़
क़ल्ब ता दस्तो कलम
Much of what you can read on this page is gathered here in print — the ghazals and sher, collected as a book.
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ग़ज़ल
Ghazal · 33 poems
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01बुर्दा ए तारीकी थी, उम्रदराज़ से माशूक़बुर्दा ए तारीकी थी, उम्रदराज़ से माशूक़उसके नूर ए महव ने मुझे, ताबिन्दा कर दिया ||
बुर्दा ए तारीकी थी, उम्रदराज़ से माशूक़उसके नूर ए महव ने मुझे, ताबिन्दा कर दिया ||
मेरे महबूब ने, कुछ यूँ इमदाद की मेरीदर्द ए दिल से, दिमाग़ को, ज़िंदा कर दिया ||
जो कफ़स में क़ैद थे, मेरे अरमां अरसे सेउसकी ज़ुल्फ़ों के बिखरने ने उन्हें, परिंदा कर दिया ||
ख़्याल ए यार तो, बाईस ए हिम्मत है मग़रउसकी एक निगाह ने मुझे, कुशींदा कर दिया ||
आम हैं क़िस्से, मुहब्बत में नेस्त हो जाने केजी कर उसकी “ना”, मैंने ये क़िस्सा, चुनिंदा कर दिया ||
दो लफ़्ज़ों से उसने, इंसान किया था मुझेउसकी ख़ामोशी ने मुझे वापस, दरिंदा कर दिया ||
कोशिश तो बहुत की थी, उसे भुलाने की “अब्दाल”हर क़ोशिश ए नाकाम ने उसे वापस, ज़िंदा कर दिया ||
02“माँ” - नहीं दिखतीमुझे हंसी में अब, खुशी नहीं दिखतीमेरी हसरत की खातिर,
मुझे हंसी में अब, खुशी नहीं दिखतीमेरी हसरत की खातिर,“माँ” दुखी नहीं दिखती
रोटियाँ तीन, औलाद ओ शौहर में बंट गयींखाली फाकों के बावजूद,“माँ” भूखी नहीं दिखती
एक रात डर कर ख़्वाब से जागा था मैंउस रात के बाद कभी,“माँ” सोती नहीं दिखती
क़द्र है रब को उसके आंसुओं की तभीमेरी फ़िक्र में ज़ाहिरन ही सहीं,”माँ” रोती नहीं दिखती
चार दीवारी की झूठी आबरू की खातिरहर क़यामत के बावजूद,"माँ" रूठी नहीं दिखती
वो लम्हा ज़र सा गुज़र, दिल सहम जाता हैजब दाख़िल ए घर पे सामने मुझे,”माँ” बैठी नहीं दिखती
“अगले दो शेर उनके लिए, जिनकी माँ अब इस दुनिया में नहीं है”
मैं फ़तह कर लूँ आसमाँ के सीनों को मगरअसल कामयाबी कभी भी,”माँ” बिना नहीं दिखती
क़यामत की तारीफ़ ये है “अब्दाल”के मैं आवाज़ देता हूँ आदतन मग़र,“माँ” नहीं दिखती
03मोहब्बत की गलियों को अब अलविदा कहते हैंमोहब्बत की गलियों को अब अलविदा कहते हैंये रास्ता क़ाबिल ए सफ़र नहीं,
मोहब्बत की गलियों को अब अलविदा कहते हैंये रास्ता क़ाबिल ए सफ़र नहीं,दास्तान-ए मोहब्बत मुर्दाबाद
बताओ क्यों ज़रूरी है, मोहब्बत जीने के लिए - Qक्या सिर्फ़ ज़िंदा रहना काफी नहीं,पहचान-ए मोहब्बत मुर्दाबाद
तेरा इश्क़, तेरा जुनून, तेरा फितूर, सब ज़ाया हैजा पहले शोहरत कमा के आ,इमान-ए मोहब्बत मुर्दाबाद
वो तो कहता था के जी नहीं सकता मेरे बिनामुझे ही मार कर चला गया,जहान-ए मोहब्बत मुर्दाबाद
जो सपने संजोये थे, उन्हें सुला दिए प्यार सेखबरदार के अब ख़्वाब देखे,ख्याल-ए मोहब्बत मुर्दाबाद
मेरा मुस्तक़बिल, उसके तबस्सुम पे क़ायम थाकौन अब तेरी राह देखेमलाल-ए मोहब्बत मुर्दाबाद
उसने आंखों में आंखें डाल, वादे किए थेगहरी नज़रों के हल्के इरादे देखेगुमान-ए मोहब्बत मुर्दाबाद
जो हाथ थामे, दुनिया घूमने की ज़िद थी उसकीवो सारे नज़ारे मैंने यकता देखेतर्जुमान-ए मोहब्बत मुर्दाबाद
एक बार और कोशिश कर, क्या पता इस बार कुछ होहर किस्सा-ए-इश्क़ अज़ाब है,कोशिश-ए-मोहब्बत मुर्दाबाद
ये रिवायत-ए-ज़माना, ये इश्क़ करना, कोई ज़रूरी नहीं “अब्दाल”अलअल ऐलान कहो और कहलवाओमोहब्बत मुर्दाबादमोहब्बत मुर्दाबाद
04हाँ, अब वो मेरे साथ नहीं हैहाँ, अब वो मेरे साथ नहीं हैये तो कोई ग़म की बात नहीं है ||
हाँ, अब वो मेरे साथ नहीं हैये तो कोई ग़म की बात नहीं है ||
हाँ, थोड़ा सफ़र मुश्किल होगा ज़ुरूरके अब मेरे हाथ में उसका हाथ नहीं है ||
थोड़ी तन्हाई सताये तो क्या मुआमलायाद तो है, सिर्फ़ मुलाक़ात नहीं है ||
मेरा तसव्वुरे “हम”, महफ़ूज़ है अफ़सोसइस धागे में अब उसकी ज़ात नहीं है ||
जज़्बातों को लफ़्ज़ों में पिरो सकूँ मैंऐसी बनी अभी कोई लोगात नहीं है ||
कलम थामे देख, घूरता है काग़ज़ मुझेतेरे काजल की स्याहि की दवात नहीं है ||
बासुकून गुज़रता है दिन “अब्दाल”अफ़सोस, के क़ब्ज़े में सिर्फ़ रात नहीं है ||
05अस्पताल ओ दवा कि जिद्दो जहद, अच्छी सज़ा है केअस्पताल ओ दवा कि जिद्दो जहद, अच्छी सज़ा है केइंसान थोड़ा थोड़ा मरता है, थोड़ा थोड़ा जीने के लिये ।।
अस्पताल ओ दवा कि जिद्दो जहद, अच्छी सज़ा है केइंसान थोड़ा थोड़ा मरता है, थोड़ा थोड़ा जीने के लिये ।।
इन दवाओं ने ढाँचा ए दिल को, जवाँ कर दिया वापस,कोई मलहम ए शिफ़ा भी लगा दे, दर्द ए सीने के लिए ।।
इलाज ए बदन की ख़ातिर, मुकम्मल इलाज दरयाफ़्त हैकोई हकीम ए रूह से मिलाओ, शिफ़ा ए कीने के लिए ।।
यूँ तो इनसाँ, काफ़ी जानता है, ज़र्रा ज़र्रा अपने वजूद कामग़र एक हादसा ज़ूरूरी है, असली आईने के लिए ।।
चलो इंतिकाल से तो बच गया, ये जिस्म ए नातवाँअब कोशिश ए ज़िंदगी करूँ, थोड़ा थोड़ा “जीने" के लिए ।।
06जिसकी मुहब्बत दुनिया में कम मशहूर हैजिसकी मुहब्बत दुनिया में कम मशहूर हैमुन्नवर है जो तेरी पेशानी पे, ये वही नूर है ॥
जिसकी मुहब्बत दुनिया में कम मशहूर हैमुन्नवर है जो तेरी पेशानी पे, ये वही नूर है ॥
दिल के साथ रखता है दिमाग़ में भी,तभी खड़ी दस्तबसता दुनिया तेरे हुज़ूर है ॥
दम ब दम है तेरा, या कोई सहारा हैतेरी कामयाबी के पीछे उसका फ़ितूर है ॥
मैं ईदैन का बेसब्री से करता हूँ इंतज़ारगले मिलने का तरीक़ा उनसे, यही मंज़ूर है ॥
ग़र माँ के क़दमों में जन्नत रखी रब नेतो इन्हें बनाया रब ने बसिफ़त ए तूर है ॥
कभी ना कहना कि क्या किया है मेरे लियेतू ना समझ सका, ये सिर्फ़ तेरा क़ुसूर है ॥
शफ्क़त ज़ाहिर करने में वह बड़ा दूर है “अब्दाल”तभी तो उसकी मुहब्बत ज़माने में कम मशहूर है ॥
07उनके हर वार हम, मुस्कुरा कर सह गयेउनके हर वार हम, मुस्कुरा कर सह गयेजब भी टूटा दिल, हम हंसते रह गये ॥
उनके हर वार हम, मुस्कुरा कर सह गयेजब भी टूटा दिल, हम हंसते रह गये ॥
क़भी ज़ुबाँ से इकरार मुमकिन ना थाजो मिली आँखों से आँखें, सब कह गये ॥
इश्क़ है मग़र, ग़ुरूर भी है ख़ुद परलफ़्ज़ फ़ना हुए, सिर्फ़ जज़्बात रह गए ॥
काका मौत चखियो, ते ना चखिए इश्क़इश्क़ के मारे कितनी सहीं बात कह गए ॥
अर्मां सारे, उनके इश्क़ में ज़िंदा रहने केज़िंदगी थम गयी, अर्मां वहीं रह गए ॥
सुबूत ए सुकून नहीं है हमारा मुस्कुरा देनामेरा सब्र मेरे तमाम मुजाहिदात कह गये॥
क्यों सोचता है इमकान-ए-हाँ के मनाज़िर “अब्दाल”उन्हें कहना था ना, वो सिर्फ़ “ना” कह गये ॥
08हिंदू, सीख, ईसाई, मुसलमान है, माफ़ कर दोहिंदू, सीख, ईसाई, मुसलमान है, माफ़ कर दोजैसा भी है, जो भी है, इंसान है ये, माफ़ कर दो ॥
हिंदू, सीख, ईसाई, मुसलमान है, माफ़ कर दोजैसा भी है, जो भी है, इंसान है ये, माफ़ कर दो ॥
कई अब भी उससे नाराज़, लोग रेहते हैं दुनिया मेंफ़िलहाल ठिकाना उसका शमशान है ये, माफ़ कर दो ॥
ज़मीं चिढ़ जाति है उसके कभी भी बरस जाने सेसूखों की प्यास बुझाता आसमान है ये, माफ़ कर दो ॥
ज़माने के सामने बेझिझक तमाचा मारा था उसनेनामर्द की आन बान शान है ये, माफ़ कर दो ॥
बिना हिमायत बिना पंख ज़रा देर से उड़ा है वोसिर्फ़ हौसलों की उड़ान है ये, माफ़ कर दो ॥
ग़ुस्से में कह दिया था, नीयत नहीं थीलग़ज़िश ए ज़बान है ये, माफ़ कर दो ॥
बिला जुर्म, सज़ा काटी है “अब्दाल”नहीं काम आसान है ये, माफ़ कर दो॥
09ऐ वक्त, अब मुझे इस क़ैद से आज़ाद करऐ वक्त, अब मुझे इस क़ैद से आज़ाद करमुझे मुझमें मुकम्मल, अकेला ही आबाद कर ॥
ऐ वक्त, अब मुझे इस क़ैद से आज़ाद करमुझे मुझमें मुकम्मल, अकेला ही आबाद कर ॥
कौन सिखाता है इल्म, ये तो अता ए रब हैअंदर झांक कर देख, ख़ुद को उस्ताद कर ॥
क्यों बजाएगी दुनिया, ताली तेरी कोशिशों पेजब तक ना हो कामयाब, ख़ुद से ख़ुद को दाद कर ॥
ग़र चाहिए कामयाबी, इश्क़ से इज्तेनाब करनहीं संभला तो फिर जा, ख़ुद को बर्बाद कर ॥
एक दिन में नहीं होती है फ़तह दुनिया “अब्दाल”एक एक कर जीत, क़तरा क़तरा इमदाद कर ॥
10अपने अशकों की क़ीमत करना तुमअपने अशकों की क़ीमत करना तुममेरे मर जाने पे ना मरना तुम ॥
अपने अशकों की क़ीमत करना तुममेरे मर जाने पे ना मरना तुम ॥
जो साथ था तो क्या वकार था तेरी निगाहों मेंअब जुदाई पे, बेइज्जत करने से ना डरना तूम ॥
इल्ज़ाम था के मैं तेरी ख़ूबसूरती पे धब्बा हूँ, ठीकअब जो ये कालिख ना, रही सुफ़ैदी में निखरना तुम ॥
मेरी आरज़ू तुम्हारे बदन को ढाँप लेने के तरीक़े कीअब जो मैं ढँका हूँ वहन में, रंगीन संवरना तुम ॥
मोम सी कोमल, ये जिस्म मलमलि, अब काम आएगीअब जब ग़ैर मेहरम छुए तो, शेहवत में पिघलना तुम ॥
मेरी रातों की हर तारीकी में सिर्फ़ तुम सुभ रही होमेरा सूरज गुरूब हुआ, उसकी बाहों में अब ढलना तुम ॥
मैंने इश्क़ ए मादरी सा पाला था तुम्हें अपने दिल मेंमैं जो जुदा हुआ, उसकी नन्ग़ी निगाहों में पलना तुम ॥
इश्क़ ए वफ़ा ने मुझे बर्बादी का समान बना दिया “अब्दाल”दुआ है के, किसी के धोके का सामान ना बनना तुम॥
11जिसे तजुर्बा ए उरूज नहीं, उसे ज़वाल से कैसा डरजिसे तजुर्बा ए उरूज नहीं, उसे ज़वाल से कैसा डरजिसे ख़ौफ़ ए जवाब नहीं, उसे सवाल से कैसा डर ॥
जिसे तजुर्बा ए उरूज नहीं, उसे ज़वाल से कैसा डरजिसे ख़ौफ़ ए जवाब नहीं, उसे सवाल से कैसा डर ॥
इंसान जीता है आख़िरत की फ़िक्र में हमेशाजो ना भी मिले दुनिया, तो मलाल से कैसा डर ॥
जिसने शरीअत को ज़ेवर ए तिजारत बना दियाइल्म हो या ना हो, हराम ओ हलाल से कैसा डर ॥
रोज़े क़यामत मुंतज़िर हैं आशिक़ दीदार केहै अभी हिजाब ए हिलाल, फ़िलहाल से कैसा डर ॥
तैयारी की हैं दुनिया कि, दग़ाबाज़ी के क़िस्से सुनवफ़ा गर करे ज़माना, तो इस ख़्याल से कैसा डर ॥
क्यों डर डर कर जीता है ज़िंदगी को आख़िरमरना तो सबको है, फिर विसाल से कैसा डर ॥
रब देखता है सिर्फ़ सीरत ए क़ल्ब को “अब्दाल”गो के उसने बनाया, फिर रंग-ए-बिलाल से कैसा डर ॥
12जो डूबा है अंधेरा, रोशनी लाचार हैजो डूबा है अंधेरा, रोशनी लाचार हैसच है कि पता नहीं, यहाँ झूठ का प्रचार है ॥
जो डूबा है अंधेरा, रोशनी लाचार हैसच है कि पता नहीं, यहाँ झूठ का प्रचार है ॥
यहां राजा हैं कुर्सी पर, जिहुज़ुरी शिष्टाचार हैढोंग है प्रणाली का, निंदनीय ये विकार है ॥
राजसत्ता की चर्बी, इक्तेदार के फ़िदाकार हैनीयत पे है सवाल, अरे ! ये तो बदकार है ॥
अपराध सिर्फ गरीब का, ये औकात का निखार हैअंधा कानून है देखता, यहाँ न्याय एक उपकार है ॥
जो प्रणाली बन गई, चलना उसपे बेकार हैहैं दीमक हर नोक पे, बेशर्म इनकी डकार है ॥
ये देश है संविधान का, और किसका अधिकार हैउबलता आक्रोश दिलों में, ये आत्म साक्षात्कार है॥
चप्पलें घिस गईं, विनती निराधार हैयुद्ध हो शांति का, बाक़ी सब इनकार है॥
यलगार हो प्रजा में, यही तंत्र आधार हैमिट गए हैं मूक जन, अब किसका इंतज़ार है ॥
जो ना खड़े हुए आज, नहीं फिर नय्या पार हैइनक़िलाब की सदा हो बलंद, यही अब उपचार है ॥
कोई नहीं बचाने आएगा, ख़ुददस्ती पे इक़रार हैहै कृष्ण तेरा सार्थी, तू स्वयं अर्जुन सा इख़्तियार है ॥
ज़ालिम को बताओ, आगे अंधकार हैडूबना ही है उसे, नहीं कोई मल्हार है ॥
भारतीय सपूत हैं हम, हम ही में निहित प्रहार हैहिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, ये भारत का आकार है ॥
हम ही भविष्य हैं भारत के, हम ही से भारत साकार हैहम ही से राष्ट्र निर्माण हो, हिन्द एकता आधार है ॥
खिलाफ नाना कुरीत के, तैयार खड़ी कटार हैजो भारत बनाम भारतीय हो, भारतीय खड़ा तैयार है ॥
> "Patriotism is supporting your country all the time, and your government when it deserves it." - Mark Twain>
> "The duty of a true patriot is to protect his country from its government." - Thomas Paine>
> "Patriotism does not oblige us to acquiesce in the destruction of liberty. Patriotism obliges us to question the actions of our government." - Arundhati Roy>
> "Patriotism means to stand by the country. It does not mean to stand by the president or any other public official." - Theodore Roosevelt>
> "I criticize America because I love her. I want her to stand as a moral example to the world." - Martin Luther King Jr.>
> "The highest patriotism is not a blind acceptance of official policy, but a love of one's country deep enough to call her to a higher plain." - George McGovern>
13मेरी भीगी शबों कि मीज़ान तू हैमेरी भीगी शबों कि मीज़ान तू हैइन खुले लबों की ज़बान तू है ॥
मेरी भीगी शबों कि मीज़ान तू हैइन खुले लबों की ज़बान तू है ॥
सेहरा ए हयात सूखा है बोझों तलेबुझे प्यास बारिश से वो इमकान तू है ॥
खुले जो आंखें सजदे को वो अज़ान तू हैदुआऐं जो क़ुबूल हों वो रिज़वान तू है ॥
हर क़यामत को हंसते हुए सहते है हमनाकाम हों कैसे हम जब इम्तेहान तू है ॥
हर इनायत को देखे दुनिया वो शान तू हैक़ुर्बान हों जिसपे मेरी जान, वो जान तू है ॥
मैं ठीक था, बदबख़्ती ओ लाचारी मेंबनाये जो मुझे इंसान, वो शैतान तू है ॥
जिसने ना तौला “अब्दाल” को, वो रय्यान तू हैआबाद करना है मुझे जिसके साथ, वो जहान तू है ॥
14जब से तूने मुझे अपना दीवाना बना रखा हैजब से तूने मुझे अपना दीवाना बना रखा हैमैंने दिल को तेरा आस्ताना बना रखा है ॥
जब से तूने मुझे अपना दीवाना बना रखा हैमैंने दिल को तेरा आस्ताना बना रखा है ॥
किसे नशा तलब है, सुकून ए दिल कि ख़ातिरमैंने शराब को, तेरे हुस्न का मयखाना बना रखा है ॥
मदहोशी को किसी गुफ़्तगू की अब क्या ज़ुरुरततूने तो मुस्कुराना भी क़ातिलाना बना रखा है ॥
एक मर्तबा तुझसे मुलाक़ात हुई थी ख़्वाबों मेंमैंने आजतक उसे अपना अफ़साना बना रखा है ॥
दुनिया के लिए मैं एक मोहज्ज़ब शख़्स हूँ लेकिनउसके इश्क़ में मैंने ख़ुद को मस्ताना बना रखा है ॥
क्या हुआ के नहीं होती मुलाक़ात उससे “अब्दाल”उसके खुतुत को मैंने अपना नज़राना बना रखा है ॥
15माँ तेरा शुक्रियामाँ तेरा शुक्रिया
माँ तेरा शुक्रिया
माँ तेरी ही वो काया है,मुझ पर तेरा ही साया हैतसव्वुर-ए-मोहब्बत-ए-रब,ज़मीं पर लाने कामाँ तेरा शुक्रिया
अपने अंदर संजोय रखा,कोख में नौ माह भिगोय रखादुनिया में मुझे लाने कामाँ तेरा शुक्रिया
जब मैं छोटा बच्चा था,हर तरह से कच्चा थाआँचल में मुझे छुपाने कामाँ तेरा शुक्रिया।
सारा जग जब सोता था,हर रात मैं रोता थागीला बिस्तर मुझसे चुराने कामाँ तेरा शुक्रिया
जब मैं भूख से रोता था,तेरी मौजूदगी का एहसास होता थाअपने अमृत से मुझे सींचने कामाँ तेरा शुक्रिया
जब कभी चोट लग जाती,दुआएँ तेरे होंठ लग जातीमेरी इबादतों का तरीका बनने कामाँ तेरा शुक्रिया
तेरे दुपट्टे का ही साया हैहर बुराई से बचाया हैअपनी जुबां का मुझे गिरदान देने कामाँ तेरा शुक्रिया
न जाने मेरी कितनी खता है,ये तेरी मोहब्बत की अता हैक़ाबिल-ए-इंसान मुझे बनाने कामाँ तेरा शुक्रिया।
शायद मैं बड़ा हो गया हूँ,सिर्फ़ पैरों पे खड़ा हो गया हूँखुद पिघलकर मुझे रौशन करने कामाँ तेरा शुक्रिया
जब सबका यकीन उठ गया थाजब ज़माना मुझसे रूठ गया थायकीन मुझ पर करने कामाँ तेरा शुक्रिया
तेरी नवाज़िशों का ही फल हैकि आज मेरा कल हैहर गुनाह को मेरे ढाँप लेने कामाँ तेरा शुक्रिया
जब तक तू साथ रहेगीज़िंदगी में कुछ बात रहेगीमेरी ज़िंदगी की ज़िंदगी बनने कामाँ तेरा शुक्रिया
ये शम्स ओ कमर, ये शजर ओ हज़र,ये दुनिया की बुलंदी, ये तरीके लचरमुझे मेरी औकात में रखने कामाँ तेरा शुक्रिया।
किस किस एहसान को याद करूँ,किसको किससे अपवाद करूँदुनिया में लाया, जीना सिखायामाँ तेरा शुक्रिया
मेरी नींदों का ख़्वाब बनने कामेरे सवालों का जवाब बनने कामेरी रातों की चादर बनने कामेरी बातों की मादर बनने कामेरे वजूद की आफ़ताब बनने कामेरे रातों का महताब बनने कामाँतेरा शुक्रिया
16चल आज तुझसे खुल कर वाज़ करता हूँचल आज तुझसे खुल कर वाज़ करता हूँहमारी कलामे-ए-इश्क का आग़ाज़ करता हूँ
चल आज तुझसे खुल कर वाज़ करता हूँहमारी कलामे-ए-इश्क का आग़ाज़ करता हूँ
वजूद ख़ालिस फ़िक्र है तजस्सुस-ए-हयात कीअपने हंसते हुए आंसूं तेरी वफ़ा पे राज़ करता हूँ
हया हो बाक़ी तो कुछ बेशर्म बात करता हूँकुछ दिल की छुपी बातें नियाज़ करता हूँ
हर ख़ाली भीड़ में तुझसे मुलाकात करता हूँअपनी हर फ़ैल में, मैं तुझे शाज़ करता हूँ
तेरे नाम हर अपनी तन्हा को रब्त करता हूँ,हर ग़म को भूल, सफर तुझमें माज़ करता हूँ
जो किया इश्क़ तो अलल ऐलान करता हूँ “अब्दाल”गर गुनाह ही सही, तेरी ख़ातिर उसपे नाज़ करता हूँ
17यूँही कोई बेवजह नाराज़ नहीं होतायूँही कोई बेवजह नाराज़ नहीं होताबिन असलों के, जंग का आगाज़ नहीं होता ॥
यूँही कोई बेवजह नाराज़ नहीं होताबिन असलों के, जंग का आगाज़ नहीं होता ॥
तपा है वो तजुर्बों की भट्टी में तभीबिन ज़ख़्मों के, पैदा कोई जाबाज़ नहीं होता ॥
मिट गई नींदें, रातों की मेहनत-काशी से,बिन इल्म के, अता कोई ऐजाज़ नहीं होता ॥
ये भूख है कि मिटती नहीं मिटाने से,बिन संगदिली के, कोई फ़ैयाज़ नहीं होता ॥
ये महकमा है बूज़दिलों का, इल्म कहाँबिन उस्ताद-ए-हक़ के, कोई शाबाज़ नहीं होता ॥
होता है प्यासा, कोई हालात का नहीं “अब्दाल”बिन मय के साक़ी, कोई दिलबाज़ नहीं होता ॥
18हर शाख़ पे हैं काँटे भूखे खून के, तू गुलफाम पैदा करहर शाख़ पे हैं काँटे भूखे खून के, तू गुलफाम पैदा करजो अबाबील से हो फतेह जंगें, वो दवाम पैदा कर ॥
हर शाख़ पे हैं काँटे भूखे खून के, तू गुलफाम पैदा करजो अबाबील से हो फतेह जंगें, वो दवाम पैदा कर ॥
मिट गई कब्रों में बदशाहों की बुलंद इमारतेंलबे मिस्कीन से निकले दुआ, वो नाम पैदा कर ॥
प्यालों में भरकर पिया है ज़माने ने शराब को हमेशापिलाई जाए आंखों से दिलों को, वो जाम पैदा कर ॥
बहुत हैं ढोंग को वजूद-ऐ-मज़हब की खातिरजो मिटे भूख गरीब की, वो राम पैदा कर ॥
उम्र बीत गयी इबादतों में वो सजदा ना कियामुनव्वर हो मस्जिद-ए-क़ल्ब वो इमाम पैदा कर ॥
ये दुनिया दौड़ है अव्वल रहने की फानी फहरिस्तों मेंउस्ताद-ए-इंसानियत से हो सबक वो गुलाम पैदा कर ॥
तारीखों की कागजों की ज़मानत है वक़्त को “अब्दाल”नेकियों के मोती कम नहीं चुनने को, नए आयाम पैदा कर ॥
19तुझसे हर सवाल का जवाब मांगूंगा,तुझसे हर सवाल का जवाब मांगूंगा,तुझसे इश्क़ हो फिर से, अज़ाब मांगूंगा ||
तुझसे हर सवाल का जवाब मांगूंगा,तुझसे इश्क़ हो फिर से, अज़ाब मांगूंगा ||
आम हैं किस्से मिल कर बिछड़ जाने के,कुछ नुमाइश हो, अंजाम नयाब मांगूंगा ||
जो उजाला था, धोखे ने नाबीना बना दिया,अब ना कर पाए रोशन, वो आफताब मांगूंगा ||
तेरी चिकनी लालियाँ, चीख कर कहती हैं मुझसेजो बदसूरत हो करीब से, वो मेहताब मांगूंगा ||
ये गरीबी, ये मुश्किल, ये तरीका-ए-कार मेरा,जो वलवला-ए-ज़माना हो जाऊं, वो आदाब मांगूंगा ||
मेरा नज़रिया-ए-शफ़क़त कैद है परों को तेरेहो दरख़्त तेरी ख्वाहिश का, वो बाग शदाब माँगूँगा ॥
जिस जिस लफ़्ज़ ने काटा है तुझे धीरे धीरे “अब्दाल”हर नुक़्ते पे होगी जंग, हर जवाब मांगूंगा ||
20उसका इश्क़ कोई और है, तो कैसी नदामतउसका इश्क़ कोई और है, तो कैसी नदामतमुझे अपनी दिल लगी की, इजाज़त तो है ॥
उसका इश्क़ कोई और है, तो कैसी नदामतमुझे अपनी दिल लगी की, इजाज़त तो है ॥
वो मेरी मौसीकी में शामिल नहीं तो क्याउसकी यादों में उन बातों की, नफ़ासत तो है ॥
हम कितना माँगें उन्हें, उन्ही से, वो ख़ुद समझ लेंमेरे हर इसरार का मना हो जाना, आफ़त तो है ॥
माना के सख़्त है, उसे किसी और के साथ देखनाउसे देखने का मिलता है मौक़ा मुझे, इनायत तो है ॥
मैं लाख मनाऊँ ख़ुद को, उसका हासिल ना होनाएक मलाल जलता है सुभ ओ शाम, अदावत तो है ॥
वो ना रही, उसकी सिर्फ़ यादें रह गयींउसके ख़तों से गुफ़्तगू, तिलावत तो है ॥
चलो जो ग़म था, इन अशआर में लिख दिएजो ना रो सका मैं मेरे दर्द में हिफ़ाज़त तो है ॥
21माना के मैं तुझसे खालिस यार नहीं करतामाना के मैं तुझसे खालिस यार नहीं करताडरता हूँ तुझसे, इसलिए इक़रार नहीं करता ॥
माना के मैं तुझसे खालिस यार नहीं करताडरता हूँ तुझसे, इसलिए इक़रार नहीं करता ॥
सीरत मेरी जो तू गुमान करना चाहेअच्छा बना ये बुरा मुझे, ज़ार नहीं करता॥
टहलीं हैं मेरी गलियों में जो यादें तेरीजो हो भी जाये बात, इज़हार नहीं करता ॥
रह कर करीब इतना, ये दूरियां कितनी तवील हैंमिले भी तो बिछड़ जाएँगे, इसलिए इसरार नहीं करता ॥
चाहूँ तो तेरी नज़र में, मुकम्मल मजनू बन जाऊँमैं पड़ूँ तेरे पीछे, ये हिम्मत मेरा मयार नहीं करता॥
दिले अक्स की तस्वीर बेखौफ़ देख “अब्दाल”बिना ख़ुद को जाने, इश्क़ शहरयार नहीं करता॥
22हूँ निर्भीक मैं, डरा नहीं, अब भी बचा उबाल हैहूँ निर्भीक मैं, डरा नहीं, अब भी बचा उबाल हैए ज़िंदगी, तैयार रह, तुझसे कई सवाल है ॥
हूँ निर्भीक मैं, डरा नहीं, अब भी बचा उबाल हैए ज़िंदगी, तैयार रह, तुझसे कई सवाल है ॥
कैसा है तेरा दामन, भरा इतना वबाल हैतारीख़ों की गवाही है, ज़माना तुझसे विसाल है ॥
आ मैदान-ए-जंग में, बता क्या ख़्याल हैफतह तो शर्तें मेरी, हारा तो ज़वाल है ॥
तुझे ना ठुकरा सके, अजब तेरा कमाल हैहै कल्ब ज़ख़्मी तो क्या, तुझी से तो निहाल है।
मौजूद सिर्फ़ दाग़ नहीं, कुछ तुझमें भी जमाल हैऐ माशूक़, सुन ले ध्यान से, बहुत हुआ मलाल है ॥
छोड़ूँगा तुझे ऐसे, की दुनिया देगी मिसाल हैख़ुदकुशी का नहीं इख़्तियार, नहीं ये हलाल है ॥
वरना तू जो है वो है, मुझमें मेरा हिमाल हैयूँ छोटा ना आंकना मुझे, मेरी जुर्रत विशाल है॥
रखता हूँ ज़िंदगी तर्ज़ पे, हर घड़ी इंतेकाल हैइनायतें महबूब ए किबरिया, रंग-ए-बिलाल है ॥
साक़ी हूँ मैं कलम का, सैय्यदी जलाल हैये नक्काशियाँ दिलों की, उकेरता “अब्दाल” है ॥
23कहाँ कहाँ से उसने उसे, छुआ होगाकहाँ कहाँ से उसने उसे, छुआ होगाजब शाम ढली होगी तो क्या हुआ होगा ॥
कहाँ कहाँ से उसने उसे, छुआ होगाजब शाम ढली होगी तो क्या हुआ होगा ॥
जो फ़रिश्ते हैं *“समझ”* के ख़ामोश रहें*“शायद”* दोनों रूह, जिस्म एक हुआ होगा ।।
ऐ शमा ना मिटा ख़ुद को, परवाने की गिर्द कसरयहाँ तू नेस्त हुआ, कोई और शबे परवाना हुआ होगा ॥
तेरा रक़्स ए नूर, रोशनी के हुज़ूर क़ाबिल नहींऐ जुगनू, तेरी ही फ़िक्र ए कुर्ब में धुँआ होगा ॥
24जो दबा है दिलों में, ज़ाहिर कर दो,जो दबा है दिलों में, ज़ाहिर कर दो,सोया था उजाला, मुझे साहिर कर दो ॥
जो दबा है दिलों में, ज़ाहिर कर दो,सोया था उजाला, मुझे साहिर कर दो ॥
गुनाहों का देवता कहा है उसने मुझेऐसी इनायत हो कि मुझे ताहिर कर दो॥
अक्सरियत मेरी फ़िज़ूलियत से थी वाक़िफ़शिकस्त-ए-नफ़्स था, वजूद मेरा काहिर कर दो ॥
धुंधली सी है कोयलों की सूफ़ैद, ज़िंदगी मेरीअपने चश्म-ए-अदब से, मुझे माहिर कर दो ॥
जो वादा है, हूरों और शराब का जन्नत मेंयार का हो साथ मेरे, ये वादा मुझपे नाज़िर कर दो॥
बिका हूँ खुद के हाथों, अपनी शहवत के बाज़ार मेंदुनिया बीच आख़िरात ख़रीदूँ, ऐसा ताजिर कर दो ॥
कुछ करो न करो, ये करना मेरी प्यास का ज़रूरतर जाए “अब्दाल”, मश्क़-ए-इश्क़ हाज़िर कर दो ॥
25मैंने अपने इश्क़ से, उसके इश्क़ का नाम सुना हैमैंने अपने इश्क़ से, उसके इश्क़ का नाम सुना हैकोई क्या करे मेरा हश्र, ऐसा अंजाम सुना है ॥
मैंने अपने इश्क़ से, उसके इश्क़ का नाम सुना हैकोई क्या करे मेरा हश्र, ऐसा अंजाम सुना है ॥
हसरत थी के कुछ नोकझोंक हमारी भी होतीमैंने उनका प्यार भरा, रोज़ाना इल्ज़ाम सुना है ॥
मेरा तोल उसकी निगाहों में, पूरा मुफ़्त रहाजान से ज़्यादा क़ीमती, मैंने उसका दाम सुना है ॥
ख़ालिस हसरत थी के कुछ पल उसके साथ होतेक़यामत है के, मैंने उनका दिन रात क़याम सुना है ॥
मेरी जुस्तजू, मेरे सीने में ही दफ़्न हो गयीउनकी आशिक़ी का हमने चर्चा आम सुना है ॥
26क़ुबूल हैतुझसे बातें करने की खातिरतुझपे हर पल मरने की खातिर
तुझसे बातें करने की खातिरतुझपे हर पल मरने की खातिरखुद को भुला देने का सौदाक़ुबूल है
तेरी बाहों में बहने की खातिरतेरी यादों में रहने की खातिरखुद से जुदा होने का सौदाक़ुबूल है
तेरी कबूलियत के लम्हों की खातिरतेरी उलझनों और ग़मों की खातिरसब कुछ गँवा देने का सौदाक़ुबूल है
तेरी महफिलों में आने जाने की खातिरतेरी ग़फलतों में कुछ पाने की खातिरइज़्ज़तदार ज़िल्लत का सौदाक़ुबूल है
तेरी आँखों में डूबने की खातिरतेरी रातों से ना ऊबने की खातिरशरीफ मुजरिम बनने का सौदाक़ुबूल है
तेरे हुस्न की झलक की खातिरतेरी ख़्वाबों की झपक की खातिरबिना नींदों के रातों का सौदाक़ुबूल है
तेरी अदाओं की बल की खातिर,तेरी शिफा की हवाओं की खातिरकिस्मत से लड़ जाने का सौदाक़ुबूल है
क़ुबूल है गवाहों का निशानक़ुबूल है क़ाज़ी का ऐलानक़ुबूल है हर मिज़ानक़ुबूल है तेरा हर इंसानक़ुबूल है तेरी हर ज़बानक़ुबूल है तेरे साथ हर इमकानक़ुबूल है तेरे साथ हर इम्तेहानक़ुबूल है तेरे ख़्वाबों का हर जहान
बस अब तू कह दे मेरी जानक़ुबूल है, क़ुबूल है, क़ुबूल है
27किसी को क्यूँ बतलाएँ अपने ग़मकिसी को क्यूँ बतलाएँ अपने ग़महमहिं हैं मर्ज़ अपने, हमहिं हैं मरहम ॥
किसी को क्यूँ बतलाएँ अपने ग़महमहिं हैं मर्ज़ अपने, हमहिं हैं मरहम ॥
हमारा दिल अब दर्द से सूख चुका हैवास्ते ज़िंदगी दरकार बस तेरी शबनम ॥
शांत नहीं ज़िंदगी, ये अंदर की बात हैचलती है एक जंग, एक तलाश बर्हम ॥
ख़ैर ज़िंदा रहना, ज़िंदगी जीना, दो बातेंजो ना जी सकें, फिर भी ज़िंदगी है अहम ॥
तेरे रहने ना रहने से कुछ फ़र्क़ पड़ता है “अब्दाल”क़ब्रिस्तान देख कर आ, ये तेरा कैसा है वहम ?
28मुझे कहाँ फ़ुरसत के मैं मौसम सुहाना देखूँशिरकत
शिरकत
मुझे कहाँ फ़ुरसत के मैं मौसम सुहाना देखूँआपकी नज़रों से निकलूँ तो ज़माना देखूँ ॥
मैं बहुत कुछ था मगर कुछ नहीं आपके लियेअब जब भी आईना देखूँ, एक दीवाना देखूँ ॥
मेरी मुहब्बत तौलने का सिर्फ़ यही तरीक़ा हैजो देखूँ आपकी आँखें, अपना पैमाना देखूँ ॥
शमा ने तवाफ ए यार में, ज़िंदगी सर्फ़ कर दीमैं वो जुगनू आशिक़ हूँ के, ख़ुद परवाना देखूँ ॥
आप ही तो ज़रूरी हैं मेरी ज़िंदगी की ख़ातिरफिर क्यूँ मैं आपका असर मुझ पे, क़ातिलाना देखूँ ॥
सच है के आप मेरी हक़ीक़त से कोसो बाहर हैंदिल के रास्ते ख़्वाब में आपका आना जाना देखूँ ॥
आपकी आवाज़ ने किया था मदहोश एक मर्तबाके अब क्या ज़रूरत है के मैं मयखाना देखूँ ॥
चलें हसरतों के बाज़ार में आपको आराम दूँबाद इश्क़ के “अब्दाल” अपना आबो दाना देखूँ ॥
29एक आशिक़ इश्क़ बेच रहा था मुझेएक आशिक़ इश्क़ बेच रहा था मुझेकहता था के ये कोई तिजारत नहीं है ॥
एक आशिक़ इश्क़ बेच रहा था मुझेकहता था के ये कोई तिजारत नहीं है ॥
मानता था के मुहब्बत कि नींव ख़ालिस दिलों का मिलन हैबनायी जाये जो पैसों से, ये इतनी सस्ती इमारत नहीं है ॥
उसे मैंने मुहब्बत के हिसाब-किताब का तजुर्बा-ए-दर्स दियाबताया कितना खर्च हुआ, इश्क़ में, के अब जीने की हालत नहीं है ॥
आओ तुम्हारी ग़लतफ़हमी, आज मैं दूर करूँअदा हो मेरी ज़ुम्मादारी, फिर खिज़ालत नहीं है ॥
जब मैने किया था इक़रार, वज़ाहत ए राय की ख़ातिरकहा के सब तो ठीक है, सिर्फ़ “वो” जमालत नहीं है ॥
अव्वल कहा बदसूरत, फिर आयी मेरी औक़ात पेअभी मैं कामयाब नहीं, के क़ुव्वत ए किफ़ालत नहीं है ॥
वो मुजस्समा हूर का, हक़ है के, ख़ूबसूरत महबूब रखेदिल से कह रहा हूँ ये, सुनो कोई शिकायत नहीं है ॥
मसला ए औक़ात ये है के कभी तो मैं उरूज पाऊँगासब हो पर तू ना हो, बता क्या ये क़ियामत नहीं है ॥
तू मुझे मेरी बदसीरती का हवाला दे, मना कर देतायूँ आशिक़ों की नीलामी, कोई बसालत नहीं है॥
इश्क़ को ऊँचे मसनदों पे बैठाना बंद करोये बर्बादी है, कोई अच्छी सफालत नहीं है ॥
शुरू होता है, हाय से, फिर निकलती हाय हैमोहब्बत मलाल है पर लायके मलालत नहीं है ॥
ग़र तूने कर ही लिया इश्क़ में ख़ुद को बर्बादकोई सुनवाई, कोई आशिक़ों की अदालत नहीं है ॥
चल तूने तो कोशिश की इन आशिक़ों को बचाने की “अब्दाल”फिर भी जो ये बर्बाद हुए, आख़िर ये इश्क़ है, कोई विलायत नहीं है॥
30मैं बातिल को लरज़ाने वाला, वस्फ़ ए मतीन हूँमैं बातिल को लरज़ाने वाला, वस्फ़ ए मतीन हूँबिन असलों के दुश्मन को दहलाने वाला मैं फ़िलिस्तीन हूँ ॰
मैं बातिल को लरज़ाने वाला, वस्फ़ ए मतीन हूँबिन असलों के दुश्मन को दहलाने वाला मैं फ़िलिस्तीन हूँ ॰
जिसका छत आसमाँ, आँसूँओं से बुझती मैं प्यास हूँबच्चों के खून से रंगीन, मैं वही अरब की ज़मीन हूँ (मैं फ़िलिस्तीन हूँ)
अक्सा का वारिस, मैं ही हूँ फ़ौज ए महदी का शहसवारलाशों की दीवार से करता हिफ़ाज़त, पेशंगोई का अमीन हूँ (मैं फ़िलिस्तीन हूँ)
बेबस माँओं की दुआ, बच्चों की चीख़ों की आवाज़ हूँजो मर कर भी ना ख़त्म हुई शमा ए तौहीद, मैं वो यक़ीन हूँ (मैं फ़िलिस्तीन हूँ)
मलबों में दबी ज़िंदगी, आग के घरों में बासुकून हूँमैं मुकम्मल जमीं पे, अपनी क़ब्र में मुक़ीम हूँ (मैं फ़िलिस्तीन हूँ)
31किसे बताऊँ की इस दिल का हाल क्या हैकिसे बताऊँ की इस दिल का हाल क्या हैख़ुद ही किया फ़ैसला फिर मलाल क्या है ।।
किसे बताऊँ की इस दिल का हाल क्या हैख़ुद ही किया फ़ैसला फिर मलाल क्या है ।।
तरीक़ ए फ़ैसला, बा दिमाग़ रहा, अमली हमेशाजो दाखिल हो दिल, फिर देख जाल क्या है ।।
मुस्तक़बिल तो है, अर्श ए मोअल्ला पे महफ़ूज़जो है मौजूदा, बता उसपे तेरा आमाल क्या है ।।
कल तक तो तू, उरूज ए ला ज़वाल का हामी थाआज निगाह ए तुलु ए शम्स पे, ये ज़वाल क्या है ।।
क्यों नहीं सीखी, ज़माने की बर्बादी से तूने हिकमतअब ना कर शिकायत मुझसे, के ये वबाल क्या है ।।
उसकी तस्वीर बनी है, सीरत ओ आदत ओ अल्फ़ाज़ सेजो लग भी जाये उसपे चेहरा, फिर विसाल क्या है ।।
तू कैसे याद करेगा उसे, जिसे कभी भुला ही नहींफिर ये लम्हा लम्हा, रह रह कर, ख़्याल क्या है ।।
तुझे तो पता था कि, ये सीरात ए दर्द ओ अज़ा है “अब्दाल”फिर इस तोहफ़ा ए इश्क़ पे, नदामत ए सवाल क्या है ।।
32डर लगता हैमेरे महबूब को दर्द-ए-मुहब्बत से डर लगता हैचाहिए सुकून-ए-इश्क़ मगर शहादत से डर लगता है ।।
मेरे महबूब को दर्द-ए-मुहब्बत से डर लगता हैचाहिए सुकून-ए-इश्क़ मगर शहादत से डर लगता है ।।
वो मेरी हर सुभ की पहली चाय सी है ज़ुरूरतहै बड़ी लज़ीज़ मगर उसकी आदत से डर लगता है ।।
उसका ख़ौफ़-ए-हिज्र मुझे बीमार कर देता हैवही है इलाज मगर अयादत से डर लगता है ।।
मुझे मंज़ूर है उसका आँखों से मुझे राख कर देनाक़यामत है के झगड़े में लताफ़त से डर लगता है ।।
तू नहीं है क़ाबिल-ए-इश्क़, कवानीन-ए-दुनिया के मुताबिक़वो फिर भी है माशूक़ मेरा, इस इनायत से डर लगता है ।।
नेस्त ही होता है इंसान, जुस्तजू ए इश्क़ में “अब्दाल”कहता हूँ ख़ुद को आशिक़ इसलिए शिकायत से डर लगता है ।।
33वक़्तन फ़वक़तन मुझे अपना रब याद आता हैवक़्तन फ़वक़तन मुझे अपना रब याद आता हैग़र ना हो ज़र ए हयात ख़ुदा कब याद आता है ?
वक़्तन फ़वक़तन मुझे अपना रब याद आता हैग़र ना हो ज़र ए हयात ख़ुदा कब याद आता है ?
उरूज ए शबाब पे इंसा अपना पिंजरा छोड़ देता हैबाद ज़वाल के उसे हिजरत का सबब याद आता है ?
तूने तो अपने क़ानून पे अपना दीन तामीर किया आदमअज़ाब पे अब तुझे आसमानी मज़हब याद आता है ?
मैं उसकी मुहब्बत को इज़्ज़त ए लाइक ना दे सकाबाद अज़ विसाल महबूबू के उसका ग़ज़ब याद आता है ?
मैं फ़क़ीर ओ गनी भी मैं सुल्तान ओ मज़लूम भी हूँतुझे मेरा क़ुव्वत ए दाम देख मेरा नसब याद आता है ?
तू बड़ा ग़ुलाम ए सरकश ए नफ़्स है “अब्दाल”हर दुर्र ए बेअदबी पे तुझे अदब याद आता है ?
शेर
Sher · 63 pieces
Standalone couplets — a complete thought in two lines, grouped by how many couplets carry it.
एक शेर · One couplet · 40
शौक ए दीद में इबादत करता रहावजह ए इबादत ख़ालिस ना रही
गुनाहों के सिलसिले ने, मुरत्तब ये असर कियामूसल्ला ख़रीदा, तौफ़ीक़ ए सजदा सिफ़र किया ||
हक़ीक़त ने ख्वाब से की ताबीर दरयाफ़्त,क्या लुत्फ था, नाबीना दुनिया देखने में
नामुमकिन है, तुम मुमकिन हो जाओ,जो मैं बनूँ रात, तुम दिन हो जाओ ||
ये तहज़ीब ए इश्क़ भी, बड़ा बदतमीज़ हैसिवा माशूक़ के, और किसी की ताज़ीम नहीं ||
क्या अज़ाबे जहन्नुम, तेरे गोशा ए ज़हन में हैअज़ाब तो ये है के, जन्नत हो लेकिन यार नहीं ॥
हम कुल समंदर जज़्ब कर बैठे हैं, वो चंद आँसू ना रोक सकेथे इल्ज़ाम कई ज़ेहन में, हम एक पे भी ना टोक सके ||
जो मयारे खुश सुखन था खत्म हो गया,आप से तुम, तुम से तू चलन हो गया
जो क़ाबिल ए ईमान नहीं तो वुजूद क्याजो नीयत ए सजदा नहीं तो सुजूद क्या ।
दुनिया रोई है मसाइल पे, तू मुझे मुहब्बत में रुलापहले दावा ए इश्क़ कर, फिर वफ़ा से मुकर जा
तू ख़ूबसूरत नहीं तो क्या, ख़ूबसीरत तो है
वो बदसूरत नहीं तो क्या, बदसीरत तो हैं
एक कून पे क़ायम दुनिया, एक कून पे फ़ना होती हैइंसाँ बर्बाद खुद नहीं होता, ख़ालिस उसकी अना होती है
शमा से कहो, परवाने की ताज़ीम करेबिना आशिक़ के, माशूक़ की औक़ात नहीं
जब कुछ कह नहीं पाता, तो कलम उठा लेता हूँदवा है ये के, दिल से सारे अलम उठा लेता हूँ
जितनी पड़ी नरमी उतने हम सख़्त हो गएथे मुस्तकीम सिरात पे, बेकार बदबख़्त हो गए
तुझसे मुख़ातिब इन आँखों ने अस्तगफ़ार कर लियातुझसे इश्क़ करके हमने ख़ुद को बर्बाद कर किया
इन अज़ीयतों का सिलसिला कब दफन होगाकहीं सोज़*-ए-*हयात, कहीं कफन होगा
हमारी मुलाक़ात महज़ इत्तिफ़ाक़ नहींये मुहब्बत है मेरी, कोई मज़ाक़ नहीं
तेरे इश्क़ ने, मोहज़्ज़ब बना दियावरना हम भी, मुजरिम मशहूर थे
गर तू कहे के सिर्फ़ मैं ही अकेला नहीं, तेरी ज़िंदगी मेंआ कुछ भीड़ इकट्ठा कर लें, धोके का सामाँ करने को
तू वो अहम हिस्सा के मिटाया नहीं जा सकतातू वो क़िस्सा है के, सुनाया नहीं जा सकता
लफ़्ज़ों की नहीं, तलवारों की धार कहें इसेदिल में आ जाए, या उतर जाने का मयार कहें इसे
वाहिद आतिशबाजीं को हय्यत नहीं इन दानों मेंतलबे फूलझड़ी हैं ये, अपनी बक़ा की ख़ातिर
हमारी आँखें मिली तो मानो चूम लिया उसनेवरना होंठों से होंठ मिलाना बड़ा गीला सौदा है
मैं नाफिस हो जाऊँगा, तुम क़ानून तो बनोमैं सुकून हो जाऊँगा, तुम जुनून तो बनो ॥
तेरी मुहब्बत में ना जाने, कितनी प्यास झेली हमनेकोई तेरा हुस्न तो पिला दे, इफ़्तार की ख़ातिर
इश्क़ जो नफ़ली मस्ती है माश की, बेफिक्र लोग करेंहमपे हैं घर की ज़िम्मेदारियाँ, हम फ़र्ज़ निभाते हैं
मैं पलकें झपकते सो गया था, उसकी यादों में खो गयानींद होश में लाती है इंसान को, मैं ख़्वाब में मदहोश हो गया
सुनो मुझे और ज़लील करो, थोड़ा और क़लील करोजब कर लो मेरा क़त्ल, मुझे क़ातिल, मुझे ही वकील करो
शबो रोज़ ये हिमायत हुई गुनहगारों की,दबो सोज़ क़यामत हुई हक़लाचारों की
जो अमलपैरा हों, ऐसे क़वानीन की गुज़ारिशें थी,तेरी ज़ुम्मदारी है के, क़ानून से इंक़िलाब लाया जाए
मैं बेपरवाह हो जाऊँगा, तू मुहब्बत दिखा तो सहींकुल मुहब्बत तेरी होगी, मुझे परवाह सिखा तो सहीं
जो चेहरे पे ये अफसूरदगी मुनव्वर हैये हक़ीक़त है के ख़ालिस मेरा डर है ॥
ये इमकान है के हम तेरे इश्क़ में सर हो जाएँमहलों की आमोज़िश में रहें, या दर दर हो जायें ॥
उसके ख्वाबों के आगोश में सो जाएंगेमेरे दर्द आज नहीं तो कल खो जाएंगे
आग को अपने वजूद से कभी गर्मी नहीं होतीजो हो जाए सख़्त दिल फिर नरमी नहीं होती
बड़ी अचरज है के इस्लाम में तकसीम हैअशरफ़ ता असलज, ये कौन सा मीम है
उसे देख कर, मैंने ख़ुद को माना कर दियाजितनी थी अना, सब फना कर दिया
दर्द ए नज़ा क़ुबूल, लेकिन फ़िक्र ए रक़ीब नहींआशिक़ी की ऐसी सज़ा, ये तो हसीब नहीं
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दो शेर · Two couplets · 16
ये जो रास्ते तेरे घर को जाता हैये कैसे कभी सुकून पाता है ?
तेरे क़दमों को जब चूमती है ज़मींआसमाँ गरजे बिना कैसे रह पाता है ?
ज़माने ने देखा के इश्क़ में इंसान कायर हो गयामेरे जज़्बात सच्चे थे, मैं सिर्फ़ शायर हो गया ॥
मैं शिकायत कर ना सका तुमसे इहतराम मेंये अशआर ज़रिया हैं के, मुक़द्दमा दायर हो गया ॥
वो फ़क़त मेरा ग़ुरूर नहीं, कुछ बात उसमें भी हैवो सारा नूर शबाब नहीं, कुछ रात उसमें भी है ।।
मुनव्वर करे जो बिछड़न, मेरे जहान ए क़ल्ब कोसिर्फ़ मैं बेचैन नहीं, कुछ वफ़ात उसमें भी है ।।
जिस फ़ानी जिस्म की गर्मी, तुझे मुहब्बत लगती हैअहले ला शऊर को यही, सही फ़ितरत लगती है ||
मुसाफ़िर ए इश्क़ से पूछो के अस्ल ख़ूबसूरती क्या हैकुछ रूह, कुछ उनके आँचल की सोहबत लगती है ||
तेरी रोशनी जग उजाला करेगातू अंधेरों में जल तो सहीं
हर मंज़िल, हर मक़सद होगा फ़तहतू हिम्मत कर चल तो सहीं
शक और शुबाह से दूर, मैंने सच्ची मुहब्बत की हैख़ुद से दूर जाकर, उनकी ओर अपनी रगबत की है ॥
कोई उनकी क़ीमत क्या लगाए, माँगा है उन्हें रब सेउन्हें उनका इश्क़ मिल जाए, दुआ की हिम्मत की है ॥
मेरी मुहब्बत ए वतन चीख उठी सबूत देते देतेके दस्तावेज़ों ने मेरी वतन परस्ती परखनी है ॥
पाँच वक़्त चूमता हूँ ज़र्रे वतन इबादत की तरहआज उसी इबादत की तुम्हें क़ीमत परखनी है ॥
तजुर्बों की भट्टी में जला हूँ मैंज़िम्मों के रास्ते चला हूँ मैं ॥
बूढ़ा कहा मेरे नज़रियों को उन्होंनेअपनी उम्र से बहुत बड़ा हूँ मैं ॥
इन खुली जुल्फों को यूँ सवारा न करोलटों को पेशानी पे यूँ आवारा न करो
क़ल्ब-ए-बेसाख़्ता को, निगाहें काफ़ी हैंयूं इन अदाओं से अब मारा न करो
मैंने उनको तस्वीरें कुल जला दींअफ़सोस, नक़्श ए यार ना भूला ।।
मैं ख़ुद, मैं ना रहा, नज़रों मेंमुझसे उनका इनकार ना भूला ।।
रात में दिन और दिन में रात याद आती हैजो उसने ना कहा, वो भी बात याद आती है
मैंने तो सिर्फ़ तस्वीरों में देखा है उसे,फिर कैसे ख़्वाबों में मुलाक़ात याद आती है
मुहब्बत की शीशी में ज़हर बेचने आया हूँजिसकी न हो सुभ वो पहर बेचने आया हूँफ़लसफ़ा ए इश्क़ बड़ा महँगा पड़ा मुझेउसी इल्म ए बर्बादी का मैं क़हर बेचने आया हूँ
वो मुझसे मुहब्बत करता है, मैं किसी और सेये निसाब ए इश्क़ गुज़र रहा है किस दौर सेउसने समझाया था मुझे के, मैं बर्बाद हो जाऊँगाउसकी आँखों से निकलता, तो सुनता गौर से
उस हार की ज़िल्लत अब तक तारी हैख़ुद ऐत्मादि कम है, पर जंग अभी जारी है
ज़िंदगी उम्मीदों के बोझ तले दब चुकी हैये उम्मीद के अब कोई उम्मीद हो, भारी है
एक हाँथ पे दूसरा हाँथ रखख़ुद को बहला लिया
जब रूठा मैं ख़ुद सेख़ुद को फुसला लिया
रंग भेद पे काफ़ी, सिर्फ़ यही प्रहार हैआराध्य राम के, ये शिव शृंगार है ॥
ये वो ज़ीनत ए मोअज़्ज़िन ए क़ाब हैनिगाह ए इश्क़ से, बिलाल का निखार है ।।
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तीन शेर · Three couplets · 7
बड़ा अजीब है, ख़ुद से अजनबी रहनारोज़ मुलाक़ात होना, हाल वही रहना ॥
ना हम, ना ग़म, ना तुम, ना मैंबस ख़्यालों ख़्वाबों में, कहीं रहना ॥
ख़ुद से मुलाक़ात करने आऊँगा ज़रूरतब तक ऐ मेरी ज़िंदगी, वहीं रहना ॥
मेरी आँखें कर गवाह, मेरे गुनाहों का अज़ाब दोमेरी नफ़रत छोढ़ो, ज़र्रा ए इश्क़ का हिसाब दो ॥
मैं यूँ तो नहीं मचलता ज़माने की ज़ुल्म अंदोज़ी सेतुमपे मर जाऊँगा, अपने ज़ुल्मो इश्क़ का निसाब दो ॥
मैं अनपढ़ हूँ तेरे इश्क़ में, कुल ज़िल्लत आँखों क़ुबूलजो तुमसे इश्क़ करने का तरीक़ा हो, ऐसी किताब दो ॥
यूँ क़रीब ना होना, की दूर हो जाओतुम हो दूर की स्याही, नूर हो जाओ ॥
हर जिस्म ए इश्क़, मश्क़ ए फसाद हैमैं मासूम क्यों रहूँ, जब तुम कुसूर हो जाओ ॥
बेबसी मेरी देखी कहाँ है ज़माने ने अब तकजब मुझ पे हो असर, तुम फ़ितूर हो जाओ ॥
एक हाँथ से दूसरा हाँथ पकड़ कर सोने की आदत है,लबों से मुस्कुरा, दिल ही दिल रोने की आदत है ।।
कभी अपने आप से पूछा नहीं के क्या है ख़ुशी तेरे लिएइनके, उनके, सबके लिए, नींद खोने की आदत है।।
जब ख़्वाब, हक़ीक़त से टकरा कर चूर चूर होता हैमुश्किलों से मोती खींच, उन्हें पिरोने की आदत है ।।
मेरे ग़मों से कह दो, अभी उम्मीद बाक़ी हैमेरी सिसकती दुआओं की रसीद बाक़ी है ॥
रूह चीखी है मजलूमों की दरिंदो के साये तलेइमाम मेहंदी, इसा की आमद मज़ीद बाक़ी है ॥
वो जो मुझपे ज़ुल्म कर, मुझे बेबस लाचार समझते हैंसब्र करें, मीज़ानो क़यामत का जलाल बज़िद बाक़ी है ॥
इश्को दिल पे ख़ंजर चलवाकर, मैंने मुस्कुराना सीखा हैहर बार उनसे मायूस, ख़ुद ही से ख़ुद को मनाना सीखा है ॥
ज़मीदोश हुए अरमाँ मेरे, उनके दस्ते करम हमेशाकैसी कशिश है के, हर दर उनकी गली जाना सीखा है ॥
क़ुबूल किया के कई ख़ामियाँ हैं हम में, मुकम्मलअपनी औक़ात से ज़्यादा हमने, याराना सीखा है ॥
अपने अंधेरे में, तेरे क़ुर्ब का नूर देखता हूँअंधा हूँ जो अंदर नहीं, कहीं दूर देखता हूँ ॥
हुस्न ए ख़ुदा की, कुल तौसीफ है यहीशह रग कभी, कभी ताब ए तूर देखता हूँ ॥
असले जन्नत क़ुर्ब ए दीद ए महबूब हैक्यूँ वो नहर ए जन्नत, वो हूर देखता हूँ ॥
सूफ़ी
Sufi · 22 pieces
Verse written toward the divine beloved — the devotional strand running through the whole collection.
सूफ़ी शेर · Sufi couplets · 13
इस ज़ौक़े इश्क का ये हाल हो जाए,चर्चा मेरे इश्क का लब-ए-चाल हो जाएहै बस हसरत यही इस ‘क़ल्ब-नामे’ की अब,धड़कन-ए-दिल-ए-महबूब हो“अल्फ़ाज़-ए-अब्दाल" ताल हो जाए
जब जब तेरी शौक़ ए दीद में,तौबा की मिक़ात याद आती है ||
हर तसव्वुर ए कुर्ब के बादअपनी औक़ात याद आती है ||
ज़ुल्मत को उनके नूर ने काफ़ूर कर दिया
जिस पर पड़ी नज़र उसे भी तूर कर दिया
तबले की ताल पे या आपकी रूखे अबरार पेमैं रक़्स करता हूँ, हर तस्ववुर ए दीद ए यार पे
मेरा हज, तस्वव्वुर ए महबूब पे कामिल हुआबिना इश्क़, मुसाफ़िर ए अरब, हिसाब करें
तड़प कर दिल में, ख्याल बेकरार आयाक्यूँ दर्द ए ज़िंदगी, शहे हमसार आया।।
रो कर दुखड़ा जब मैं, दरे महबूब-ए-अबरार आया,मन कुँ तो मौला कहा, मुश्किलकुशा ज़ुल्फ़िकार आया।।
ग़ौस, क़ुतुब, अब्दाल, कलंदर
सारे मरातिब हक़ हैं
क्या यही करम नहीं
के उसने दोस्त कहा
ज़िक्र ए रब से मैं, वसफ़ ए अहद निकलाकुल जो हुआ तामीर, इश्क़ ए मुहम्मद निकला
मैं एक तमन्ना ए “कुन” हूँ जो, क़ुदरत की रहमत ए “फ़या कुन” की तलाश में हूँ ॥
जब दीदार ए काबा हो और नियत ए तवाफ होवज्द ए कुर्ब ए रब में रक़्स, कुल जमीं मताफ हो
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इश्क़ मुस्तफ़ा ने पुल पार करा दियाकोई मुझे मेरी जन्नत मदीने ले चलो
मैं आँखें बंद कर, तसव्वुर ए महबूब से पाक हुआज़माने ने फ़तवा ए वूज़ू दिया, नींद समझकर ।।
क़ल्ब ए नाक़िस महव ए ज़ब्त हुआ तेरे तसव्वुर ए अक्स पर
साहिब ए वज्द ने इज़हार ए इश्क़ किया गिर्द तेरे रक़्स कर
सूफ़ी ग़ज़ल · Sufi ghazals · 9
01Sufi Ghazal 1ये किस बेजा इश्क़-ए-ज़लीलि की बू हैजब रक़्स-ए-रूह को दम-ए-अल्लाहू है ।।
ये किस बेजा इश्क़-ए-ज़लीलि की बू हैजब रक़्स-ए-रूह को दम-ए-अल्लाहू है ।।
उन अब्द, मुझ साक़ी में, सिर्फ़ फ़र्क़ यहीमेरी दुनिया, उनकी नस, अल्लाह खू है ।।
फ़िदाका रूहि व क़ल्बि सादिक़ निदामसर्रते रब्बी हबली उम्मती चार सू है ।।
मजाल मुश्किलों की के दम भरे जुर्रतमन कुंतो मौला, मुश्किलकुशा तू है ।।
बहरे हिजाबत तर्बियत तलबि अज़ीमकुल रूहे ग़ुलामी, क़ादरी लहू है ।।
वो ग़रीब नवा बादशाहे हिन्दोस्ताँइस हुकूमत में मुलाज़मी आरज़ू है ।।
कुल ज़िंदगी सर्फ़ करूँ नात-ए-महबूब मेंसिर्फ़ तेरा रुख तेरी रज़ा, तू जुस्तजू है ।।
02Sufi Ghazal 2तेरी हसरत-ए-दीद, मेरे महबूब मैं तर्क करता हूँहक़ तो ये है के, मैं मुस्तहिक-ए-दीद नहीं ।।
तेरी हसरत-ए-दीद, मेरे महबूब मैं तर्क करता हूँहक़ तो ये है के, मैं मुस्तहिक-ए-दीद नहीं ।।
वो ख़्वाबों का वूज़ु, वो इश्क़ की मेराज मेरीतड़प भी है, तलब भी है, सुबूत को रसीद नहीं ।।
वो तेरी शीरी की सेहरी, वो नूर के पाक रोज़ेइफ़्तारी को ख़याल तेरा, मगर मेरी ईद नहीं ।।
वो कहते हैं के, नाउम्मीदी कुफ़्र है अब्दालतू ही वाली मेरा, मुझको मुझसे उम्मीद नहीं ।।
ख़त्म ये गुज़ारिश, इस उम्मीद ए शफाअत पर हो गयीमैं कुल गुनाहों में मुबतेला, मेरा ज़र्रा भी सईद नहीं ।।
ऐ नूर के नूरूलहुदा, सरे मेहशर मेरा भरम रखनामैं ना माँग पाऊँगा आका, मैं मुसतहिक ए दीद नहीं ।।
03Sufi Ghazal 3जो मैं ना माँगूँ दुआ, क्या मेरे रब को पता नहींबा गुनाह चेहरा बेदाग़ है, क्या यही अता नहीं ॥
जो मैं ना माँगूँ दुआ, क्या मेरे रब को पता नहींबा गुनाह चेहरा बेदाग़ है, क्या यही अता नहीं ॥
दे दिया इतना के, औक़ात ओ सोच से है परेमाँगना कुछ ख़ुद से ज़र्रा भी, क्या ये खता नहीं ॥
ये इश्क़ ए बारी, रब से जब हो गयीख्वाहिशें क्या, ख़ुद मैं, मैं रहता नहीं ॥
मुझे ना छेडो, वह समीन उन अलीम हैसब है उसे पता, मैं सिर्फ़ कहता नहीं ॥
हर गुनाह करेगा मेरा रब मुआफ़, है वादा उसकाबस कभी ना शिर्क करना, ये बात वो सहता नहीं॥
सत्तर माँओं से ज़्यादा शफ़्क़त का है रब से रिश्ता“अब्दाल”बहक सकता है, मगर ये रिश्ता होता कभी मुनकता नहीं ॥
04Sufi Ghazal 4अपने अंधेरे में, तेरे जलवों का नूर देखता हूँअंधा हूँ जो अंदर नहीं, कहीं दूर देखता हूँ ।।
अपने अंधेरे में, तेरे जलवों का नूर देखता हूँअंधा हूँ जो अंदर नहीं, कहीं दूर देखता हूँ ।।
हुस्न ए ख़ुदा की, कुल तौसीफ है यहीशह रग कभी, कभी ताब ए तूर देखता हूँ ।।
असले जन्नत क़ुर्ब ए दीद ए महबूब हैक्यूँ वो नहर ए जन्नत, वो हूर देखता हूँ ॥
05Sufi Ghazal 5तजल्लियात अपनी मुझपे अयाँ कर देतेरा मेरा ताल्लुक़ अब बयाँ कर दे
तजल्लियात अपनी मुझपे अयाँ कर देतेरा मेरा ताल्लुक़ अब बयाँ कर दे
रंग दे अपने रंग में, ऐ मेरे महबूबनिगाह ए इश्क़ से मुझे आशना कर दे
जो देखे मुझे दुनिया, तो तूझे देखेनक़्श दे ऐसा कि, तुझे बयाँ कर दे
06Sufi Ghazal 6जले दिल जहाँ इश्क़ में तेरे,मिले सुकून वस्ल की आग में
जले दिल जहाँ इश्क़ में तेरे,मिले सुकून वस्ल की आग में
मोरी शब हो तेरे बाग़ मेंहर शाम ढले तेरी राग में
जले दिल जहाँ इश्क़ में तेरेमिले सुकून वस्ल की आग में
ऐसा रंग चढ़े मदीने का हूबहुपुकारे दुनिया मजनू चार सू
वो बिलाल की अहद निदामदनी ग़ुलामी की आरज़ू
जहन्नुम तो डर है सौदे काकहीं नाराज़ ना हो जाए तू
पशेमानम सा मैं भी लिखूँनदामत की ख़ुशू ओ खूज़ू
कुछ तड़पूँ मक्के की बात मेंनज़्र हों आँसू तैबा की नात में
रूह का नहीं वज़ू, नहीं क़ाबिले बरगाहउम्मीद है सिर्फ़ आपकी शफ़ीक़ आदात में
ये लिखा कभी ना सुना पाऊँक़ब्र को काफ़ी है बाक़सम
गुज़री है चाँद घड़ियाँआपकी हमदो नात में
07Sufi Ghazal 7मेरी तलब भी, तेरे करम का सदक़ा हैये पाँओ उठते नहीं, उठाए जाते हैं ॥
मेरी तलब भी, तेरे करम का सदक़ा हैये पाँओ उठते नहीं, उठाए जाते हैं ॥
किसी की क्या बिसात के, तुझसे इश्क़ करेआंसू जो बहते हैं सजदे में, बहाए जाते हैं ॥
ये लुत्फ़, ये खुमार, ये कैफ़ियत ए वज्दरूखे ए महबूब के ग़ोते, दिलाए जाते हैं ॥
उसे पसंद है तेरा तरीक़ा ए इज़हार ए इश्क़तभी तो बार बार, दस्त दूआ में उठाये जाते हैं ॥
दरबार ए आली मरतबत को पलकों से चूमा मैंनेशुक्र है के वो आदाब ए शौक़ सिखाये जाते हैं ॥
तेरी तड़प, दूर रह कर ही, तुझे नफ़ा देती है सालिकपुल सिरात पे चले, जो हाज़िरी को बुलाये जाते हैं ॥
या रसूलअल्लाह, हम भिखारी हैं मदीने केइसीलिए, दुनिया में मर्तबे पे बिठाए जाते हैं ॥
वो क्या मंज़र होगा, महशर की हैबत में “अब्दाल”प्यासे को मुद्दतों के, वो जाम ए दीद पिलाए जाते हैं ॥
08Sufi Ghazal 8अपनी मुहब्बत से, मेरे दिल को पाक कर देतेरी शौक़ ए दीद में, ये सीना चाक कर दे ॥
अपनी मुहब्बत से, मेरे दिल को पाक कर देतेरी शौक़ ए दीद में, ये सीना चाक कर दे ॥
किसे तलब ए जन्नत है, शराबो हूर कि ख़ातिरकब्र ए आशिक़ को, तैबा की ख़ाक कर दे ॥
जिसको जिसको पर्दे में तेरे हुस्न का दीदार हुआमुझे सिर्फ़ तसव्वुरे तजल्ली से हलाक कर दे ॥
09Sufi Ghazal 9मेरी चाहत ए दीद, तेरा हिजाब हैबता ये इश्क़ का कैसा निसाब है॥
मेरी चाहत ए दीद, तेरा हिजाब हैबता ये इश्क़ का कैसा निसाब है॥
जितना तुझे पढ़ा सुना है किताबों मेंतू ही मेरा आफ़ताब, तू ही महताब है॥
नुक़्ता ए गुनाह से पाक कर इन आँखों कोफिर देख सामने, दर ए महबूब का मिहराब है॥
तौफ़ीक़े ए दुआ ए इश्क़ ओ दीद अता कर या रबबस इसी पे टीका, मेरा ज़वाल या मेरा शबाब है॥
धोती है जो तेरी बारगाह के फ़र्श को बौछारमेरा आबे ज़म ज़म, वही मेरा दोआब है॥
अपनी औक़ात से ज़ायद माँग रहा हूँ मैं आकाए राह तिल आशिक़ीन, नहीं करता तू हिसाब है॥
तू ना चाहे तो कभी ना उठाना पर्दा मेरे महबूबइमकान ए दीद की तलब, यही मेरी शराब है
ग़र कभी उठा पर्दा, इस कुत्ते पे “अब्दाल”आँखें नीची कर लूँगा, नहीं मुझमें शिहाब है ॥
हिंदी
Hindi · 1 piece
On trying to write in Hindi alone — and finding that Urdu arrives anyway.
बड़ी कोशिश की लिखने कि कुछ, सिर्फ़ हिंदी मेंउर्दू आ ही जाती है मेरी मुहब्बत, नुक़्ता ओ बिंदी में ॥